शिवसेनाः उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे
– फोटो : पीटीआई (फाइल)
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कृषि विधेयक को लेकर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शन शुरू है। लोकसभा में इस विधेयक का समर्थन करने वाली शिवसेना भी अब इसे लेकर मुखर हो गई है। शिवसेना ने पार्टी के मुखपत्र में लिखा है कि यह विधेयक कृषि प्रधान देश के लिए शोकांतिका है। यदि हरसिमरत कौर के इस्तीफे से केंद्र सरकार जाग गई तो ठीक है। वरना, इसके विरोध में सभी विपक्षी दलों को एकजुट होना पड़ेगा।
शिवसेना के मुखपत्र में “अकाली दल का झटका” शीर्षक के तहत प्रकाशित संपादकीय में लिखा गया है कि संसद के मानसून सत्र के दौरान केंद्र में अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर के इस्तीफे से थोड़ी बहुत खलबली मची है। क्योंकि वह न सिर्फ अकाली दल की केंद्र में प्रतिनिधि हैं बल्कि अकाली दल के सर्वेसर्वा प्रकाश सिंह बादल की बहू भी हैं।
शिवसेना पहले ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग हो चुकी थी और अब अकाली दल ने चिंगारी फेंकी है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक ने भी इस विधेयक का विरोध किया है। उनको लगता है कि इस नीति से किसान बर्बाद हो जाएंगे।
मोदी सरकार की आर्थिक, व्यापार व कृषि नीतियां संदेहास्पद है
शिवसेना ने लिखा है कि सरकार एक तरफ एयर इंडिया, हवाई अड्डे, बंदरगाह, रेलवे और बीमा कंपनियों को निजीकरण के कुएं में ढकेल रही है। वहीं, दूसरी तरफ किसानों को व्यापारियों और आढ़तियों के हाथ सौंप रही है। इसलिए मोदी सरकार की आर्थिक, व्यापार व कृषि संबंधी नीतियां शंका पैदा कर रही है।
अगर, मान भी लिया जाए कि इससे किसानों को अच्छा भाव मिलेगा। तो फिर किसान संगठनों से जुड़े लोगों से बात करने में क्या दिक्कत थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार जैसे नेता को बुलाकर बात करनी चाहिए थी। लेकिन अब संवाद या चर्चा जैसे शब्दों से केंद्र सरकार का संबंध ही नहीं रहा। इसलिए किसानों के हित के लिए सबको साथ आना ही होगा।
सार
शिवसेना के मुखपत्र में “अकाली दल का झटका” शीर्षक के तहत प्रकाशित संपादकीय में लिखा गया है कि संसद के मानसून सत्र के दौरान केंद्र में अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर के इस्तीफे से थोड़ी बहुत खलबली मची है…
विस्तार
कृषि विधेयक को लेकर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शन शुरू है। लोकसभा में इस विधेयक का समर्थन करने वाली शिवसेना भी अब इसे लेकर मुखर हो गई है। शिवसेना ने पार्टी के मुखपत्र में लिखा है कि यह विधेयक कृषि प्रधान देश के लिए शोकांतिका है। यदि हरसिमरत कौर के इस्तीफे से केंद्र सरकार जाग गई तो ठीक है। वरना, इसके विरोध में सभी विपक्षी दलों को एकजुट होना पड़ेगा।
शिवसेना के मुखपत्र में “अकाली दल का झटका” शीर्षक के तहत प्रकाशित संपादकीय में लिखा गया है कि संसद के मानसून सत्र के दौरान केंद्र में अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर के इस्तीफे से थोड़ी बहुत खलबली मची है। क्योंकि वह न सिर्फ अकाली दल की केंद्र में प्रतिनिधि हैं बल्कि अकाली दल के सर्वेसर्वा प्रकाश सिंह बादल की बहू भी हैं।
शिवसेना पहले ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग हो चुकी थी और अब अकाली दल ने चिंगारी फेंकी है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक ने भी इस विधेयक का विरोध किया है। उनको लगता है कि इस नीति से किसान बर्बाद हो जाएंगे।
मोदी सरकार की आर्थिक, व्यापार व कृषि नीतियां संदेहास्पद है
शिवसेना ने लिखा है कि सरकार एक तरफ एयर इंडिया, हवाई अड्डे, बंदरगाह, रेलवे और बीमा कंपनियों को निजीकरण के कुएं में ढकेल रही है। वहीं, दूसरी तरफ किसानों को व्यापारियों और आढ़तियों के हाथ सौंप रही है। इसलिए मोदी सरकार की आर्थिक, व्यापार व कृषि संबंधी नीतियां शंका पैदा कर रही है।
अगर, मान भी लिया जाए कि इससे किसानों को अच्छा भाव मिलेगा। तो फिर किसान संगठनों से जुड़े लोगों से बात करने में क्या दिक्कत थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार जैसे नेता को बुलाकर बात करनी चाहिए थी। लेकिन अब संवाद या चर्चा जैसे शब्दों से केंद्र सरकार का संबंध ही नहीं रहा। इसलिए किसानों के हित के लिए सबको साथ आना ही होगा।
via Growth News https://growthnews.in/%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a4%bf-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%87/